के.पी में फलादेश के निर्णय हेतु मुख्य एवं सहयोगी भावों को मिलाकर फल कथन की एक मौलिक प्रणाली है |
मुख्य भाव -जैसे द्वितीय भाव -धन ,त्रतीय भाव -लेखन ,चतुर्थ भाव- माता या शिक्षा,षष्ठ भाव -नौकरी ,सप्तम भाव -विवाह आदि से हम इनके विषय में सामान्य तौर से विचार करते हैं |सहायक भाव -किसी घटना के होने से जीवन के अन्य पक्षों में होने वाले प्रभावों से जुड़े भावों भावों को जोड़ा जाता है . जैसे हम विवाह के बारे में सोंचें तो विवाह के लिए सप्तम स्थान का विचार किया जाता है | विवाह के बाद परिवार में एक व्यक्ति बढ़ जाता है अतः द्वितीय भाव एक सहायक स्थान है , साथ ही एक मित्र/ दुःख सुख में साथ देने वाला और सच्चे मन से चाहने वाला प्राणी पातें हैं इसलिए एकादश भाव दूसरा सहायक स्थान है | अतः विवाह के लिए सातवे प्रमुख भाव के साथ दुसरे एवं ग्यारहवें भाव को सहायक भावों को लिया जाता है |
इसी प्रकार संतान के लिए पंचम प्रमुख भाव है ,संतान होने के बाद परिवार में वृद्धि होती है इसलिए दूसरा भाव ,संतान होने से इच्छा पूरी होती है अतः लाभ (एकादश )भाव सहायक भाव होते हैं |
इसी प्रकार नौकरी के लिए छठा भाव देखते है क्योंकि छठा -सेवा है ,जहाँ नौकरी की जाती है, वह सातवे भाव से देखा जाता है और छठा भाव सातवे के लिए व्यय स्थान होता है | धन के रूप में जो हमें दिया जाता है वह हमारी आय होती है | वह दुसरे भाव से ,धन कमाने व् नौकरी करने से जो सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है अतः दशम भाव साथ ही मित्रता मनोकामना अवं धन लाभ के कारण लाभ (ग्यारहवा) स्थान सहायक होता है इसलिए नौकरी के विषय में हमेशा छठे भाव के साथ ,दुसरे दसवे एवं ग्यारहवे भाव को देखकर ही निर्णय लिया जाता है |
अब कैसे फलादेश में उपयोग किया जाता है -
प्रत्येक भाव का उपनक्षत्र स्वामी (सब लोर्ड ) उस भाव के फलो का निर्णायक है कि फल मिलेंगे या नहीं मिलेंगे ,और मिलने वाले फल अनुकूल या प्रतिकूल होंगे ?
सबसे पहले संभावित घटना के प्रमुख एवं सहायक भावों का चयन करे |
अब देखे की संभावित घटना के प्रमुख भाव का सब लोर्ड -उस प्रमुख भाव का या अन्य सहयोगी भावो में से किसी एक भाव का कारक हो तो घटना संभव है |
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